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समाचार ब्यूरो
17/03/2022  :  18:23 HH:MM
चुनाव, होली और हेल्दी हिदायतें
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होली आने वाली है। या आ ही गई है, लेकिन उससे पहले ही पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे आ गए हैं। जिनके चेहरों पर विजय का गुलाल मला जा चुका है, वे सारे राजनीतिक दल रंगीन ठंडाई छान-छून कर भांगड़ा कर रहे हैं। जो लोग हार चुके हैं, उनकी होली को तो बदरंग होना ही है और वह हो भी गई है। ऐसे सभी उम्मीद के मारों के पास पांच साल की प्रतीक्षा के सिवा कोई विकल्प शेष नहीं बचा है। ये सभी भूतपूर्व पराजित प्रत्याशी सोच रहे हैं कि जिस तरह पिछले इतने सारे साल ‘अच्छे दिन’ के आने के इंतजार में काट लिए है, वैसे ही अगले पांच साल भी कट ही जाएंगे। बुरे दिन जल्दी पीछा नहीं छोड़ते हैं और अच्छे दिन हैं कि कभी आने का नाम नहीं लेते हैं। हो सकता है, कभी आ ही जाएं और जब आ जाएंगे, तब शायद इनके आंगन में भी एक-न- एक दिन होली का रंग जरूर बरसेगा और झमाझम बरसेगा। अभी तो इन सबकी ‘खाए गोरी का यार, बलम तरसे, रंग बरसे’ वाली ग्रहदशा ही चल रही है।विजय-गति को प्राप्त कर चुका एक नेता कहता है, ‘तुम सबने मेरे पक्ष में मतदान किया है और मुझे सत्ता की गुझिया खिलाई है, तो मेरा भी कर्त्तव्य बनता है कि मैं भी तुम्हारी थाली में अन्न के कुछ दाने बराबर डालता रहूं। बिना दाना डाले, तो चिड़िया भी नहीं फंसती है। सोचो भी, होली हर साल आएगी और चुनाव भी बराबर आते ही रहेंगे। हमको फिर- फिर टिकटार्थी बनना होगा, तो तुम जैसे लाभार्थियों की जरूरत बनी ही रहनी है। हमने तो यह भी सोच रखा है कि हम भले ही अपने वोटरों को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार नहीं देंगे लेकिन उनकी रसोई में लाभार्थी छाप नमक का पैकेट डालकर उनकी होली को रंगीन बनाते रहेंगे।’ जनता भी सोचती है कि आज के समय में मां के दूध का कर्ज चुकाने से अच्छा है कि वह कर्ज में डूबे रहकर भी जिसने नमक खिलाया है, पहले भक्तिभाव से उसका हक अदा करे। उसने कर दिया है।






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