25/04/2022  :  11:46 HH:MM
कट्टरता के दानव को वश में कर सकता है सिनेमा
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इन दिनों दिनों मेरी हर सुबह 2013 में आई अभिषेक कपूर की फिल्म ‘काई पो चे’ में अमित त्रिवेदी-स्वानन्द किरकिरे के कंपोजीशन ‘सुलझा लेंगे रिश्तों का मांझा’ से होती है। उठती हूं तो यह दिमाग में चल रहा होता है। किरकिरे का यह गीत फिल्म में चित्रित 2000 के दशक के अहमदाबाद के तार-तार हुए सामाजिक तानेबाने की पार्श्वभूमि में बहुत सधा हुआ, समझदार, गंभीर और साथ-साथ आशावादी भी है। यह वही समय है जब गुजरात भूकम्प, गोधरा और सांप्रदायिक दंगों के दौर से गुजरा था।






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